1320 मेगावाट बिजली खरीद पर प्रमुख सचिव का स्पष्टीकरण, कहा-नियमों और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया का हुआ पालन

देहरादून। 1320 मेगावाट थर्मल पावर की प्रस्तावित बिजली खरीद प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों पर प्रमुख सचिव ऊर्जा डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम ने स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने कहा कि बिजली खरीद की पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों, तकनीकी आवश्यकताओं, प्रतिस्पर्धी निविदा और उत्तराखंड विद्युत नियामक आयोग (यूईआरसी) की स्वीकृति के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है। इसका उद्देश्य किसी एक कंपनी को लाभ पहुंचाना नहीं, बल्कि राज्य की दीर्घकालिक बिजली जरूरत को पूरा करना है।

पांच कंपनियां RFQ चरण में योग्य

प्रमुख सचिव ने कहा कि यह धारणा सही नहीं है कि बिजली खरीद का कार्य किसी एक कंपनी को बिना प्रतिस्पर्धा के दिया जा रहा है। Request for Quotation (RFQ) चरण में पांच कंपनियां योग्य पाई गई हैं। इसके बाद Request for Proposal (RFP) प्रक्रिया में भी प्रतिस्पर्धा कायम है। अंतिम चयन प्रतिस्पर्धी बोली के दौरान प्राप्त कुल टैरिफ के आधार पर किया जाएगा।

उन्होंने बताया कि 1320 मेगावाट बिजली की व्यवस्था 25 वर्षों की दीर्घकालिक बेस-लोड आवश्यकता को ध्यान में रखकर प्रस्तावित की गई है। इससे भविष्य में राज्य के उपभोक्ताओं को पर्याप्त और भरोसेमंद बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

संयंत्र के लिए देश में कहीं भी उपयुक्त स्थान का विकल्प

डॉ. सुंदरम ने कहा कि उत्तराखंड पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील और पर्यटन एवं तीर्थाटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य है। थर्मल पावर प्लांट के लिए बड़ी मात्रा में कोयले की जरूरत होती है। लंबी दूरी तक कोयला पहुंचाने से परिवहन लागत बढ़ सकती है। इसी कारण निविदा में संयंत्र को देश में किसी भी उपयुक्त स्थान पर स्थापित करने का विकल्प रखा गया है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उत्तराखंड में संयंत्र स्थापित करने पर कोई रोक नहीं है। यदि कोई कंपनी राज्य में संयंत्र लगाकर प्रतिस्पर्धी दर पर बिजली उपलब्ध कराती है, तो वह भी निर्धारित प्रक्रिया में भाग ले सकती है।

कुल टैरिफ के आधार पर तय होगा उपभोक्ताओं पर असर

प्रमुख सचिव ने कहा कि बिजली उत्पादन स्थल से उत्तराखंड तक बिजली पहुंचाने की ट्रांसमिशन व्यवस्था और उसकी लागत निविदा एवं टैरिफ की शर्तों के अनुसार तय होगी। इसलिए केवल संयंत्र के दूसरे राज्य में स्थापित होने के आधार पर अतिरिक्त खर्च का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। उपभोक्ताओं पर वास्तविक वित्तीय प्रभाव का आकलन कुल बिजली टैरिफ के आधार पर किया जाएगा।

उन्होंने Fixed Charge की सीमा 70 से बढ़ाकर 75 प्रतिशत किए जाने पर भी स्थिति स्पष्ट की। उनके अनुसार बोलीदाताओं की लागत, ईंधन की उपलब्धता और संभावित स्थानों की परिस्थितियों को देखते हुए यह प्रस्ताव रखा गया था, ताकि Fuel Charge को 25 प्रतिशत तक रखने की सुविधा मिल सके। बिजली की कीमत का आकलन केवल Fixed Charge से नहीं, बल्कि Fixed Charge और Variable/Fuel Cost को मिलाकर बनने वाले कुल टैरिफ से होता है।

पहली यूनिट 42 और दूसरी 48 माह में उपलब्ध कराने का लक्ष्य

राज्य की बिजली जरूरत को जल्द पूरा करने के लिए परियोजना को चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराने की समयसीमा तय की गई है। पहली यूनिट के लिए 42 माह और दूसरी यूनिट के लिए 48 माह का समय निर्धारित किया गया है। यह समयसीमा परियोजना निर्माण की तकनीकी एवं व्यावहारिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तय की गई है।

UJVNL-THDC संयुक्त उपक्रम का विकल्प भी था

डॉ. सुंदरम ने बताया कि बिजली की आवश्यकता पूरी करने के लिए UJVNL और THDC के संयुक्त उपक्रम के विकल्प पर भी विचार किया गया था। हालांकि THDC, NTPC की सहायक कंपनी है और उसे निर्धारित नीतियों एवं आवश्यक स्वीकृतियों का पालन करना होता है। THDC की मुख्य विशेषज्ञता जल विद्युत और Pumped Storage Projects में है। इन परिस्थितियों में संयुक्त उपक्रम को आगे नहीं बढ़ाया जा सका और प्रतिस्पर्धी निविदा के माध्यम से बिजली खरीद का विकल्प अपनाया गया।

25 वर्षों में संभावित भुगतान का अनुमान

प्रमुख सचिव ने कहा कि 25 वर्षों में ₹1.60 लाख करोड़ से ₹1.66 लाख करोड़ के संभावित भुगतान का उल्लेख एकमुश्त राशि नहीं है। यह पूरी अवधि में होने वाले संभावित कुल भुगतान का अनुमान है। राज्य की भविष्य की बिजली जरूरत का आकलन Central Electricity Authority की Resource Adequacy Study के आधार पर किया गया है।

उन्होंने कहा कि वास्तविक भुगतान अंतिम टैरिफ, बिजली की आपूर्ति, प्लांट की उपलब्धता और अनुबंध की अन्य शर्तों पर निर्भर करेगा। पूरी प्रक्रिया में कंपनियों के सुझावों और आपत्तियों का परीक्षण किया गया है तथा आवश्यक बदलावों को यूईआरसी के समक्ष रखकर स्वीकृति प्राप्त की गई है। अंतिम चयन प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर ही होगा।

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