लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन (लीपा) के प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखंड ने भारत सरकार, भारतीय प्रेस परिषद से प्रिंट मीडिया पॉलिसी 2020 का विरोध किया

लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन (लीपा) के प्रदेश अध्यक्ष, उत्तराखंड, ने प्रिंट मीडिया से संबन्धित प्रकाशकाें / पत्रकारों की समस्याओं पर सरकार को पत्र लिख कर अवगत किया :-

  1. जीएसटी- सरकार द्वारा सभी श्रेणी के कागज,स्याही आदि पर जीएसटी लगाकर समाचार पत्रों पर बड़ा आर्थिक भार डाल दिया इससे लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्र घोर आर्थिक बदहाली के दौर से रहे हैं और आधे समाचार पत्र या तो बंद हो गए है या बंदी के कगार पर है।
  2. डी ए वी पी नई दिल्ली ,भारत सरकार की नोडल एजेंसी के रूप में कार्यरत है।वर्ष 2016 में प्रिंट मीडिया विज्ञापन नीति 2016 लायी गई जिसके माध्यम से “प्वाइंट मार्किंग” की पॉलिसी चालू की गई एवं पॉलिसी में समाचार पत्रों की गुणवत्ता की दुहाई देते हुए एलिजिबिलिटी हेतु 45 अंक की अनिवार्यता करदी हैं यह जटिलता प्रकाशकों के सामने रखकर अधिकांश समाचार पत्रों को सरकार ने बंदी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया और बड़ी संख्या में युवा पत्रकार/मीडिया कर्मी बेरोजगार हो गए है। अतः इस मार्किंग नीति को हटाया जाना भी आवश्यक है।
  3. सभी मीडिया कर्मी इस कोरोना काल में अपनी जान की सुरक्षा को जोख़िम में डालकर पूरे देश में कोरोंना वॉरियर के रूप में लगे हुए है ऐसे में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार ने फाइल संख्या M24013/55/2017MUC-(Vol-ll ) दिनाक 23.07.2020 के माध्यम से गुपचुप तरीके से रिवाइज प्रिंट मीडिया 2020 लागू करके 1 अगस्त 2020, से नई प्रिंट मीडिया लागू करदी यहां तक कि भारतीय प्रेस परिषद को भी दरकिनार कर दिया इससे सभी प्रकाशकों/ पत्रकारों के सामने बहुत बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई है और अगर यहीं व्यवस्था जारी रखी जाती है तो अधिकांश पत्रकार / मीडिया कर्मी बेकारी एवं भूखमरी के कगार पर आ जायेंगे। अतः हम सभी इसका पुरजोर विरोध करते हुए सरकार से मांग करते है कि उक्त पॉलिसी को तत्काल वापस ले अथवा निम्न प्रावधनों में संशोधन करे।
  • A: लघु एवं मध्यम श्रेणी के समाचार पत्रें का बजट कम करनाः-
    प्रिंट मीडिया विज्ञापन नीति 2016 तहत लघु समाचार पत्रों के लिये 15 प्रतिशत बजट निर्धारित किया था जबकि विज्ञापन नीति 2020 में कुल विज्ञापन साईज का 15 प्रतिशत कर दिया है जो कि करीब बजट का 2 प्रतिशत ही होगा। स्पष्ट है कि 25 हजार सर्कुलेशन तक के समाचार पत्रें का जीवित रहना मुश्किल हो जाएगा, इसी तरह मझौले समाचार पत्रों की स्थिति है।
    संदर्भ – बिन्दु 12.1
  • B: सूचीबद्ध समाचार पत्रों की विज्ञापन दरों की रेट कॉन्टेक्ट नवीनीकरण अवधि को कम किया जाना:-                        विज्ञापन नीति 2016 के प्रस्तर 10 ,के अनुसार रेट कॉन्ट्रैट की अवधि तीन वर्ष थी जो कि नई नीति के बिन्दु संख्या 7-6-2 के अनुसार अवधि 2 वर्ष कर दी गयी है जिसका कोई औचित्य नहीं है।
  • C: प्रिंट मीडिया नीति 2016 के प्रावधानों के अन्तर्गत 45 हजार की संख्या के उपर प्रसार के लिये RNI/PBI/ABC से जांच का प्रावधान था जिसको बदलकर 25000अथवा ऊपर व्यवस्था कर दी इससे सभी मध्यम श्रेणी के अखबार इस परिधी में होंगे जो बड़ा कुठाराघात है। बिन्दु संख्या 7-5-1 के अनुसार।
  • D: विगत आंकड़ों से लघु एवं मझौले समाचार पत्रें का क्रमशः 15 प्रतिशत एवं 35 प्रतिशत के विज्ञापन दिये जाने के सापेक्ष में बहुत ही कम विज्ञापन निर्गत किये जा रहे है, ऐसी विषम परिस्थितियों में विज्ञापन नीति 2020 थोपा जाना बहुत बड़ा कुठाराघात होगा।

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