प्रजापिता ब्रहमा युग प्रवर्तक दृष्टा एवं नारी शक्ति प्रेरक (51वी स्मृति दिवस) – डी0डी0 मित्तल

आध्यात्मिक मूल्यों के प्रणेता प्रजापिता ब्रहृमा कुमारी ईश्वरीय विश्व-विद्यालय का नाम आज भारत के कोने-कोने में ही नही बल्कि विश्व के 145 देशों में है, जहां बाबा के अपने सेन्टर स्थापित होने के साथ आज बाबा के बच्चों की संख्या लाखों में हो गयी है। भारतवर्ष वैसे तो संत, महात्माओं की भूमि जानी जाती है, किन्तु इनमें एक विशेष नाम ब्रहृमाकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के संस्थापक दादा लेखराज है, जिन्हे प्रजापिता ब्रहृमा के रूप में जाना जाता है। दादा लेखराज ने 5-7 माताओं और बहनों को साथ लेकर इस यज्ञ का प्रारम्भ किया था, यह वह समय था जब नारी शक्ति को समाज में वह स्थान नही दिया जा रहा था जिसकी वह हकदार थी, नारी की आवाज को दबाया जा रहा था, ऐसे में 60 वर्ष की उम्र में इन्होने यज्ञ का प्रारम्भ किया।
दादा लेखराज का जन्म 15 दिसम्बर 1876 को सिंध प्रान्त जो आजकल पाकिस्तान में है, एक कृपलानी परिवार में हुआ था। बचपन से ही वे साधारण मृदुभाषी स्वभाव के थे एवं उनका व्यवसाय हीरे जवाहरात का था। वह आमतौर से उस समय बड़े-बड़े राजा, रजवाडों से ही सम्पर्क रखते थे, एवं उनकी आवश्यकतानुसार गहनों के डिजाइन स्वयं करते थे। राजा रजवाडों को भी दादा (लक्खी दादा) पर बहुत विश्वास था। बचपन से ही वे धार्मिक प्रवृति के थे, पूजा पाठ करते थे एवं करीब 12 गुरू भी बनायें, किन्तु परमात्मा को प्राप्त करने की प्यास बनी रही। तभी सन् 1936 शिवरात्री को अचानक साक्षात्कार शिव बाबा ने कराया जो निराकार है।
बाबा पहले तो डर गये किन्तु लेखराज दादा को यह अनुभूति हुयी कि शिव बाबा को सृष्टि का परिवर्तन करना है, इसके लिए लेखराज दादा केा तन रथ के रूप में इस्तेमाल होना है। तभी आपके द्वारा ओम मंडली बनाई गई ओर अपनी समस्त बैसियत तन, मन, धन के साथ ओम मंडली की माताओ, बहनों के नाम लिख दी। अभी तक समाज ज्ञान मार्ग की पूजा पद्वतियों एवं धर्म ग्रन्थ, शास्त्रों के भंवरजाल में फंसे हुये थे, इन भां्रतियो से किसी भी धर्मगुरूओ अथवा संस्था ने बाहर निकालने का प्रयास नही किया। मसलन आत्मा से परमात्मा, मानव जन्म की लाखों योनियाॅ, कण-कण में भगवान श्रीकृष्ण गीता में भगवानुवाच आदि आदि। इन सब पर पर्दा उठाया स्वयं परमपिता परमात्मा शिव बाबा ने। शिव बाबा स्वयं दादा लेखराज के तन का सहारा लेकर उनकी वाणी से सभी मानव जाति को यह स्पष्ट संदेश दिया कि हम सभी आत्मा है, जो अजर-अमर है। यह न जन्म लेती है और न ही इसकी मृत्यु होती है, सिर्फ हम अपना शरीर दूसरा धारण करते है। यह कल्प भी सिर्फ 5000 वर्ष का है न कि लाखों वर्ष, परमात्मा एक ही है जिसको हम शिव कहते है। 5000 वर्ष का कल्प भी 1250-1250 वर्ष के चार युग है। सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग एवं प्रत्येक 5000 वर्ष के अन्त में (पुरूषोत्तम युग में) स्वयं परमात्मा का अवतरण होता है, जो जीवन मृत्यु से परे है।
बाबा स्वयं कल्प के अन्त में आकर जिसे पुरूषोत्तम युग (100) वर्ष का कहा जाता है, हम बच्चों को तगोप्रधान से सतोप्रधान बनाकर नये युग (स्वर्ग) में ले जाते है, जहाॅ सतोप्रधान आत्माऐ ही नम्बरवार जायेगी, इन्हे बाबा स्वयं लेने आया है। इसी भ्रांति के साथ परमात्मा कण-कण में व्याप्त नही है, बल्कि सतयुग से ही आदि सनातन देवी देवता धर्म का प्रारम्भ बताया, श्री कृष्ण एवं राधे सतयुग के प्रथम प्रिन्स (लक्ष्मी नारायण है, न कि भगवान/परमात्मा क्योंकि परमात्मा जन्म मरण से परे है। गीता के भगवान स्वयं शिव है (भगवानुवाच)) दादा लेखराज ने संस्था की मुख्य बागडोर भी माताओं और बहनों को दी, जो आज भी यथावत है एवं विश्व की यह अनूठी संस्था है। यह संस्था प्रारम्भ में सात दिवस का कोर्स कराकर आत्मा का परमात्मा से परिचय देने के साथ विकारों से मुक्त होकर पवित्रता का अभ्यास के साथ योग कराती है इससे विकर्मो का नाश होता है।
प्रजापिता ब्रहृमा बाबा ने 60 वर्ष की आयु से इस यज्ञ को प्रारम्भ कर 1969 तक यज्ञ की पालना की एवं 18 जनवरी को अव्यक्त होकर अभी भी सूक्ष्म रूप से यज्ञ की पालना का कार्य कर रहे है ऐसा सभी का मानना है। गुड़गांव/बादशाहपुर शाखा ने बाबा के स्मृति दिवस को बड़ी धूमधाम से मनाया इसमें सेक्टर 4 की दीदी सुदेश ने आकर बाबा के बारे में विस्तृत जानकारी दी, वहीं दीदी अलका ने भी योग की बारिकियां बताई एवं बहन सोनिया ने सभी को बच्चों को एक घंटे का योग कराया। दीदी माधुरी ने भी योग की बारिकियां बताई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *