ऑल इंडिया स्मॉल एंड मीडियम न्यूजपेपर्स फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को पत्र लिख कर कहा, लघु एवं मझोले समाचार पत्रों के साथ हो रहे भेदभाव पर ध्यान आकर्षित करे।

आल इंडिया स्माल एंड मध्यम न्यूज़ पेपर्स फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरिंदर सिंह ने उत्तराखंड ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को पत्र लिख कर, उनका ध्यान लघु एवं मझौले समाचार पत्रों के साथ हो रहे भेदभाव की ओर आकर्षित किया है। गुरिंदर सिंह ने कहा सरकार के सूचना एवं लोक संपर्क विभाग के दभावपूर्ण व्यवहार के कारण लघु एवं मझौले समाचार पत्र बंदी के कगार पर है। इन्ही अखबारों से जुड़े लाखों पत्रकारों और कामगारों के सामने बेरोजगारी व भुखमरी की समस्या खड़ी हो गई है। लघु एवं मझौले समाचार पत्र ही लोकतंत्र के सच्चे हितैषी होते हैं और इन समाचार पत्रों का सीधा संपर्क जनता से होता है। लघु एवं मझौले समाचार पत्र ज्यादातर जिनमें साप्ताहिक एवं आवधिक समाचार पत्र शामिल है, के प्रकाशक स्वयं श्रमजीवी होते हैं और वे ही समाचार पत्र के प्रकाशन, मुद्रण और प्रसारण का कार्य स्वयं, परिवारीजनों और संपर्क के लोगों के माध्यम और उनके सहयोग से करवाते है।

गुरिंदर सिंह ने कहा बड़े समाचार पत्रों के प्रकाशक और स्वामी पत्र कारिता के अलावा अन्य कई तरह की गतिविधियों में लिप्त होते है और उन्हें विज्ञापन कई अन्य माध्यमों से कामर्शिय ल दर पर प्राप्त होते है। वे कारपोरेट सेक्टर से भी जुड़े रहते है। इसके लिए उनके पास आर्थिक संसाधन पर्याप्त होते है। जबकि लघु एवं मझौले समाचार पत्रों के पास विज्ञापन प्राप्त करने के सीमित स्रोत होते है, जिनमे सरकारी विज्ञापन ही महत्वपूर्ण और मुख्य स्रोत है। इस कारण लघु और मझौले समाचार पत्र अधिकांशत: सरकारी विज्ञापनों पर ही निर्भर रहते है। सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किये जाने वाले सजावटी विज्ञापनों से इन समाचार पत्रों का प्रकाशन करते रहने में सहायता मिलती है। बड़े समाचार पत्रों की तुलना में लघु एवं मझौले समाचार पत्र जनता से अधिक निकटता बनाये रखते है। गांव-गांव तक इनकी पहुंच होती है। जन समस्या ओं को सरकार और प्रशासन के सामने रखना इन समाचार पत्रों का मुख्य उद्देश्य होता है। जबकि बड़े समाचार पत्र कारपोरेट सेक्टर के उद्देश्यों का ध्यान में रखकर अखबारों में समाचारों को वरीयता प्रदान कर स्थान देते है।

उनका कहना है के काफी समय से लघु एवं मझौले समाचार पत्रों के हितों पर कुठाराघात किया जा रहा हैं। उनको कभी – कभी सरकार द्वारा जारी होने वाले सजावटी विज्ञापन जारी होते है। ज्यादातर सजावटी विज्ञापन बड़े समाचार पत्रों को जारी करके छोटे व मध्यम वर्ग के समाचार पत्रों के आर्थिक हितों पर कुठाराघात किया जा रहा है। बड़े ही समाचार पत्रों को सजावटी विज्ञापन जारी कर सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग द्वारा छोटे व मध्यम समाचार पत्रों के अस्तित्व को मिटाया जा रहा हैं क्योंकि लघु एवं मझौले समाचार पत्रों से जुड़े लोग कि सी दूसरे व्यवसाय से भी नहीं जुड़े होते और न ही इतने बड़े पूंजीपति होते कि समाचार पत्र का प्रकाशन अपने आर्थिक संसाधनों से करते रहें और लोकतंत्र के सजग प्रहरी के रूप में अपनी भूमिका का निर्वहन भी करते रहें। समाचार पत्र के प्रकाशन से ही उनकी आजीवि का जुड़ी होती है वे समाचार पत्र को मिलने वाले विज्ञापनों से ही अपना तथा अपने यहां काम करने वाले पत्रकारों व अन्य कर्मियों के परिवारों का भरण पोषण करते हैं। सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग के पिछले तीन वर्ष का विज्ञापन वितरण देखें का अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होगा कि लघु एवं मझौले समाचार पत्रों को बड़े समाचार पत्र समूहों की तुलना में काफी कम विज्ञापन दिये गये है। आपकी सरकार में सूचना एवं लोक सम्पर्क विभाग द्वारा लघु एवं मझौले समाचार पत्रों के साथ किया जा रहे भेदभाव से यह समाचार पत्र वर्ग बंदी व भुखमरी के कगार पर है। किसी भी लोकप्रिय सरकार का यह नैतिक दायित्व भी बनता है कि वो समाज के हर वर्ग के हितों की रक्षा करें।

गुरिंदर सिंह ने यह भी कहा के ऐसे में आपसे अपेक्षा है कि आप लघु एवं मझौले समाचार पत्रों के हितों की रक्षा के लिए सूचना एवं लोक संपर्क विभाग द्वारा विज्ञापनों के वितरण में हो रहे इस भेदभाव को समाप्त करने के लिए निर्देशित करेंगे साथ ही लघु एवं मझौले समाचार पत्रों की लोकतंत्र के प्रति सच्ची सेवा को ध्यान में रखते हुये उन्हें शासन स्तर पर अधिक से अधिक विज्ञापन जारी किये जाने के लिए आदेशित करेंगे।
सादर सहित!

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